नकली बनारसी साड़ी का मुद्दा पहुंचा PM मोदी तक, ज्वाइंट कमिश्नर ने भी माना कि गंभीर है मामला
बनारस। भौगोलिक उपदर्शन यानी जीआई प्राप्त बनारसी साड़ी के बांग्लादेश
में बनने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। सोमवार को बनारसी साड़ी को विश्व
पटल पर रखने वाले मार्केटिंग इंचार्जों ने एक लेटर प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी को लिखा है, ताकि यह मामला अंतराष्ट्रीय कोर्ट जेनेवा में उठाया जाए
और बांग्लादेश में इस साड़ी का उत्पादन तत्काल बंद कराया जाये।
ज्वांट कमिश्नर ने माना, मामला है गंभीर
सोमवार को ज्वाइंट कमिश्नर (उद्योग) उमेश कुमार सिंह ने एक प्रेसवार्ता करते हुए इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीर माना है। ज्वाइंट कमिश्नर ने बताया कि भौगोलिक उपदर्शन यानी जीआई एक कानून है जिसमें एक व्यवस्था दी गयी है कि ऐसे क्षेत्र विशेष के उत्पाद के लिए जो उस विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पीढ़ियों और सदियों से वहां के लोगों द्वारा तैयार की जाती है, उसकी कोई नक़ल नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि बनारस में ऐसे कई उत्पाद हैं। इसमें बनारसी साड़ी भी एक मुख्य उत्पाद है। अधिकारी के अनुसार अभी ये मामला मीडिया के जरिये संज्ञान में आया है, विभाग की ओर से इसे गंभीरता से लिया गया है।
जीआई एक महत्वपूर्ण हथियार है
ज्वाइंट कमिश्नर (उद्योग) उमेश सिंह ने बताया की जीआई का मुख्य उद्देश्य है कि उस भौगोलिक क्षेत्र के उत्पाद को संरक्षित और विकसित किया जाए, जिससे उसकी पहचान बनी रहे। साथ ही साथ रोज़गार में वृद्धि हो, उसके बाज़ार में वृद्धि हो, उसके उत्पाद को वाजिब मूल्य मिले। जीआई इसके लिए महत्वपूर्ण हथियार है। उन्होंने बताया कि इस नाम से यदि किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में या अन्य देश में उत्पाद बनाकर बेचा जाएगा तो निशिचित रूप से जीआई प्राप्त वास्तु के मुख्य कारीगर परेशान होंगे।
मीडिया करे लोगों को जागरूक
ज्वाइंट कमिश्नर ने कहा कि हम मीडिया के माध्यम से लोगों को जीआई के बारे में जागरूक करना चाहते हैं। यह अगर भारत के किसी अन्य शहर में होता तो हम स्वयं इसपर कार्रवाई करते लेकिन मामला चूंकि दूसरे देश से जुड़ा है इसलिए हमने एक लेटर प्रधानमंत्री महोदय को संबोधित करते हुए उनके संज्ञान के लिये भेजा है। इसके अलावा वाणिज्य उद्योग मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को भी हम लिख रहें है कि वो इसके अन्तरराष्ट्रीय कोर्ट तक पहुंचाए, ताकि इस नाम (बनारसी) का उपयोग कही और न होने पाए।
9 सितम्बर 2009 को बनारसी साड़ी को मिला जीआई
इस दौरान वाराणसी के जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनीकांत ने बताया कि दिसम्बर 1999 में संसद ने भौगोलिक उपदर्शन प्रोटक्शन अधिनियम के अंतर्गत एक कानून पारित किया गया और डब्लूटीओ के द्वारा आयोजित एक संधि सभी देशों से हस्ताक्षर करवाया। जो भी इस संधि को नहीं मानेगा यह बौद्धिक संपदा अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। बनारसी साड़ी का 9 सितम्बर 2009 में जीआई हुआ था।
पहले ही बेनकाब हो चुका है बांग्लादेश
उन्होंने यह भी बताया कि 6 फरवरी को गुवाहाटी में अन्तरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर में बाग्लादेश ने 16 स्टाल लगाए थे। इसमें बांग्लादेश की प्रेस रिलीज़ में लिखा गया कि बांग्लादेश के स्टाल पर बनारसी साड़ी उपलब्ध है। यह बात समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थी।
बुनकरों की मांग जेनेवा में उठाएं पीएम मोदी
डॉ रजनीकांत ने कहा कि हमने प्रधानमंत्री से मांग की है कि जिस तरह कुछ वर्ष पूर्व दार्जलिंग चाय का नाम फ्रांस की एक चाय कंपनी द्वारा इस्तेमाल करने पर अन्तराष्ट्रीय कोर्ट में आवाज़ उठाई गयी थी, उसी तरह गरीब बुनकरों के हक़ की आवाज़ जेनेवा के अन्तराष्ट्रीय कोर्ट में उठाकर बनारसी साड़ी के अस्तित्व की रक्षा की जाए।
ज्वांट कमिश्नर ने माना, मामला है गंभीर
सोमवार को ज्वाइंट कमिश्नर (उद्योग) उमेश कुमार सिंह ने एक प्रेसवार्ता करते हुए इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीर माना है। ज्वाइंट कमिश्नर ने बताया कि भौगोलिक उपदर्शन यानी जीआई एक कानून है जिसमें एक व्यवस्था दी गयी है कि ऐसे क्षेत्र विशेष के उत्पाद के लिए जो उस विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पीढ़ियों और सदियों से वहां के लोगों द्वारा तैयार की जाती है, उसकी कोई नक़ल नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि बनारस में ऐसे कई उत्पाद हैं। इसमें बनारसी साड़ी भी एक मुख्य उत्पाद है। अधिकारी के अनुसार अभी ये मामला मीडिया के जरिये संज्ञान में आया है, विभाग की ओर से इसे गंभीरता से लिया गया है।
जीआई एक महत्वपूर्ण हथियार है
ज्वाइंट कमिश्नर (उद्योग) उमेश सिंह ने बताया की जीआई का मुख्य उद्देश्य है कि उस भौगोलिक क्षेत्र के उत्पाद को संरक्षित और विकसित किया जाए, जिससे उसकी पहचान बनी रहे। साथ ही साथ रोज़गार में वृद्धि हो, उसके बाज़ार में वृद्धि हो, उसके उत्पाद को वाजिब मूल्य मिले। जीआई इसके लिए महत्वपूर्ण हथियार है। उन्होंने बताया कि इस नाम से यदि किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में या अन्य देश में उत्पाद बनाकर बेचा जाएगा तो निशिचित रूप से जीआई प्राप्त वास्तु के मुख्य कारीगर परेशान होंगे।
मीडिया करे लोगों को जागरूक
ज्वाइंट कमिश्नर ने कहा कि हम मीडिया के माध्यम से लोगों को जीआई के बारे में जागरूक करना चाहते हैं। यह अगर भारत के किसी अन्य शहर में होता तो हम स्वयं इसपर कार्रवाई करते लेकिन मामला चूंकि दूसरे देश से जुड़ा है इसलिए हमने एक लेटर प्रधानमंत्री महोदय को संबोधित करते हुए उनके संज्ञान के लिये भेजा है। इसके अलावा वाणिज्य उद्योग मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को भी हम लिख रहें है कि वो इसके अन्तरराष्ट्रीय कोर्ट तक पहुंचाए, ताकि इस नाम (बनारसी) का उपयोग कही और न होने पाए।
9 सितम्बर 2009 को बनारसी साड़ी को मिला जीआई
इस दौरान वाराणसी के जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनीकांत ने बताया कि दिसम्बर 1999 में संसद ने भौगोलिक उपदर्शन प्रोटक्शन अधिनियम के अंतर्गत एक कानून पारित किया गया और डब्लूटीओ के द्वारा आयोजित एक संधि सभी देशों से हस्ताक्षर करवाया। जो भी इस संधि को नहीं मानेगा यह बौद्धिक संपदा अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। बनारसी साड़ी का 9 सितम्बर 2009 में जीआई हुआ था।
पहले ही बेनकाब हो चुका है बांग्लादेश
उन्होंने यह भी बताया कि 6 फरवरी को गुवाहाटी में अन्तरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर में बाग्लादेश ने 16 स्टाल लगाए थे। इसमें बांग्लादेश की प्रेस रिलीज़ में लिखा गया कि बांग्लादेश के स्टाल पर बनारसी साड़ी उपलब्ध है। यह बात समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थी।
बुनकरों की मांग जेनेवा में उठाएं पीएम मोदी
डॉ रजनीकांत ने कहा कि हमने प्रधानमंत्री से मांग की है कि जिस तरह कुछ वर्ष पूर्व दार्जलिंग चाय का नाम फ्रांस की एक चाय कंपनी द्वारा इस्तेमाल करने पर अन्तराष्ट्रीय कोर्ट में आवाज़ उठाई गयी थी, उसी तरह गरीब बुनकरों के हक़ की आवाज़ जेनेवा के अन्तराष्ट्रीय कोर्ट में उठाकर बनारसी साड़ी के अस्तित्व की रक्षा की जाए।


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